चीन-भारत संबंध पुनः प्रस्थान से पुनः उन्नयन तक
सितंबर को, ब्रिक्स देशों के नेताओं का 18वाँ सम्मेलन भारत की राजधानी नयी दिल्ली में आयोजित हुआ। सम्मेलन के दौरान, चीन और भारत दोनों देशों के नेताओं की मुलाकात हुई, जिसमें चीन-भारत को साझेदार बनने पर महत्वपूर्ण आम सहमति हासिल की गई, और चीन-भारत संबंधों को "पुनः प्रस्थान" से "पुनः उन्नयन" की ओर ले जाया गया। भारत की रणनीतिक बिरादरी और मीडिया ने भी नेताओं की इस बैठक की चीन-भारत संबंधों पर पड़ने वाली मार्गदर्शक भूमिका की भरपूर सराहना की।
पहले, दोनों देशों के नेता चीन-भारत संबंधों के विकास के लिए उच्च-स्तरीय राजनीतिक मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। चीन हमेशा के लिए चीन-भारत संबंधों को रणनीतिक ऊँचाई और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से देखता और विकसित करता आया है। भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने इसकी भारी सराहना की और माना कि नेताओं की बैठक ने भारत-चीन संबंधों को सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ाया है, जो दोनों देशों के 280 करोड़ से अधिक लोगों के सामूहिक हितों के अनुरूप है। भारत और चीन दोनों सभ्यताएँ हजारों वर्षों से आपसी आदान-प्रदान और सीखने के माध्यम से साथ-साथ आगे बढ़ी हैं। भारत भी भारत-चीन संबंधों को रणनीतिक ऊँचाई और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से देखता है, और चीन के साथ प्रतिद्वंद्वी के बजाय साझादार बनना चाहता है। वह एक-दूसरे के विकास को चुनौती के बजाय अवसर के रूप में देखता है। भारत पक्ष स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करता है, और चीन के साथ संबंधों का विकास किसी तीसरे पक्ष से प्रभावित नहीं होता। भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस वार्ता का मूल्यांकन "रचनात्मक और भविष्योन्मुखी" के रूप में किया, और माना कि चीन-भारत संबंध धीरे-धीरे सामान्य पटरी पर लौट रहे हैं। भारतीय पक्ष ने द्विपक्षीय संबंधों को रणनीतिक ऊँचाई से देखने, मतभेदों का उचित प्रबंधन करने, और सीमा मुद्दे को पूरे द्विपक्षीय संबंध को बंधक बनाने से रोकने पर सहमति व्यक्त की।
भारत के प्रमुख मीडिया ने चीन-भारत नेताओं की बैठक पर गहरा ध्यान दिया। हिन्दुस्तान टाइम्स और फर्स्टपोस्ट जैसे मीडिया ने माना कि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान चीन-भारत नेताओं की मुलाकात एक सकारात्मक कदम है, भारत-चीन संबंध भारत की अर्थव्यवस्था के विकास और बहुपक्षीय कूटनीति को बढ़ावा देने के लिए फायदेमंद है और अगर ब्रिक्स तंत्र अधिक प्रभावशाली भूमिका निभाना चाहता है, तो चीन के साथ व्यावहारिक सहयोग अनिवार्य है।
दूसरे, दोनों देशों के नेताओं ने द्विपक्षीय व्यावहारिक सहयोग को लागू करने को आगे बढ़ाया। चीन के नेताओं ने चीन-भारत सहयोग में पारस्परिक लाभ और पारस्परिक सफलता के सिद्धांत से एक-दूसरे को सशक्त बनाने की वकालत की। विशेष रूप से, विकास के इस सबसे बड़े साझा आधार पर ध्यान केंद्रित करते हुए दोनों पक्षों को मैत्रीपूर्ण आदान-प्रदान और पारस्परिक लाभ वाले सहयोग को मजबूत करना चाहिए। जन-स्तरीय एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान, सीधी उड़ानों और अन्य क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार करके दोनों देशों के रिश्ते के लिए जनमत का आधार सुधारा जाना चाहिए। आपसी व्यापार-आर्थिक चिंताओं को संतुलित ढंग से हल किया जाना चाहिए, ताकि दोनों देशों के व्यापार-आर्थिक संबंध स्वस्थ और स्थिर रूप से विकसित हो सकें। इस पर मोदी ने कहा कि भारत पारस्परिक सम्मान और पारस्परिक विश्वास की नींव पर चीन के साथ उच्च-स्तरीय आदान-प्रदान बनाए रखना, रणनीतिक संवाद को मजबूत करना, पारस्परिक लाभ वाले सहयोग को बढ़ावा देना, मानविकी आदान-प्रदान को और घनिष्ठ बनाना, और दोनों देशों के संबंधों को और बड़े विकास की ओर ले जाना चाहता है।
इस संबंध में भारत के व्यावसायिक जगत ने सकारात्मक रुख अपनाया है और माना है कि विकास ही भारत-चीन के बीच सबसे बड़ा उभयनिष्ठ हित है। भारत और चीन की अर्थव्यवस्थाओं में पूरकता प्रबल है तथा विनिर्माण, हरित ऊर्जा, डिजिटल अर्थव्यवस्था सहित कई क्षेत्रों में सहयोग की गुंजाइश मौजूद है। वे चीन के प्रति व्यापार अवरोधों को कम करने, लोगों की आवाजाही को फिर से बढ़ाने और चीनी पूँजी तथा आपूर्ति श्रृंखला के अवसरों का लाभ उठाकर भारत के अपने विकास को आगे बढ़ाने की इच्छा रखते हैं। कुछ व्यावसायिक लोगों का मानना है कि चीनी वस्तुओं के लिए बाजार खोलने से भारत के घरेलू विनिर्माण क्षेत्र पर असर पड़ेगा, जिससे "मेक इन इंडिया" के गहन विकास में बाधा आएगी।
कुल मिलाकर भारत के मीडिया और रणनीतिक बिरादरी का आम मत है कि नेताओं की बैठक भारत-चीन संबंधों के विकास और दोनों देशों के बीच सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए लाभदायक है। दो विकासशील बड़े देशों के रूप में भारत और चीन के बीच स्थिर द्विपक्षीय संबंध, ब्रिक्स तंत्र के सहयोग को बढ़ाने तथा वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, जबकि भारत-चीन के बीच टकराव से ब्रिक्स तंत्र का समग्र प्रभाव कमजोर होगा। भारत की चीन-नीति को "शून्य-योग सोच से बाहर निकलने" की अपील करने वाली आवाजें बढ़ रही हैं। कुछ राष्ट्रवादी जनमत द्वारा चीन-नीति को बंधक बनाने की आलोचना की जा रही है तथा यह माना जा रहा है कि चीन के प्रति अत्यधिक शत्रुता भारत के अपने आर्थिक हितों को नुकसान पहुँचाएगी, और दोनों देशों के बीच गरीबी उन्मूलन, डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों में सहयोग की व्यापक गुंजाइश है।

(यांग रुई, कम्युनिकेशन यूनिवर्सिटी ऑफ चाइना के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ में एसोसिएट प्रोफेसर तथा अकादमी ऑफ इंटरनेशनल एंड रीजनल कम्युनिकेशन स्टडीज़ के पाकिस्तान रिसर्च सेंटर की निदेशक। यह लेख केवल लेखक के व्यक्तिगत विचारों को दर्शाता है।)