एक-एक मीटर आगे बढ़ते कदमों के साथ मंजिल करीब! चीलोंग सीमा चौकी को फिर से खोलने की मुहिम पर तीन पत्रकारों की रिपोर्ट


चित्र जन-दैनिक से है।

सीमा द्वार की ओर बढ़ते कदमों की रवानगी

“चीलोंग सीमा चौकी तक जाने वाला सड़क मार्ग सफलतापूर्वक बहाल कर दिया गया!”

यह खबर मिलते ही पूरा चीलोंग कस्बा तुरंत सक्रिय हो उठा। सड़क किनारे खड़े बचाव वाहनों को चालू किये गए और विभिन्न बचाव दल पूरी तैयारी के साथ चीलोंग सीमा चौकी के मुख्य द्वार वाले क्षेत्र की ओर रवाना हुए।

सक्रिय होना ही सभी की उम्मीद थी। आपदा के बाद से मृतकों और लापता लोगों की स्थिति ने हर किसी का दिल बेचैन कर रखा था। लेकिन राष्ट्रीय राजमार्ग G-216 के कुछ हिस्सों के क्षतिग्रस्त होने के कारण बड़ी संख्या में बचाव दल बाहरी इलाकों में ही फंसे हुए थे और चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे।

सक्रियता में ही उम्मीद है। आपदा को आए एक सप्ताह से अधिक समय बीत चुका था, लेकिन मृतकों और लापता लोगों की तलाश हर हाल में जारी रखनी थी। चाहे आगे मोर्चे पर जुटे बचावकर्मी हों या चीलोंग कस्बे में तैयार बैठे दल, उनके मन में यह संकल्प कभी कम नहीं हुआ।

एक-एक मीटर आगे बढ़ते कदम

लगातार कई दिनों और रातों तक कानों में मशीनों की गड़गड़ाहट और आंखों के सामने लगातार भाग-दौड़ करते बचावकर्मियों की तस्वीर रही। बचावकर्मी एक-एक मीटर आगे बढ़ते रहे। बचावकर्मी आराम करते रहे, लेकिन मशीनें लगातार चलती रहीं, ताकि सड़क को जल्द से जल्द बहाल किया जा सके।

सड़क को बहाल करना केवल इस सड़क को खोलने के लिए नहीं था। आपदा के केंद्र में तंबुओं में रह रहे बचावकर्मियों ने बताया कि शुरुआती दौर में सड़क मार्ग बाधित होने के कारण उन्हें रस्सियों के सहारे नीचे उतरने और पैदल आगे बढ़ने जैसे तरीकों से ही घटनास्थल तक पहुंचना पड़ता था। इससे न केवल शारीरिक थकान अधिक होती थी और जोखिम बढ़ जाता था, बल्कि तलाश का दायरा और बचाव कार्य की दक्षता भी काफी प्रभावित होती थी।

सड़क मार्ग बहाल होने के साथ ही विभिन्न बचाव दलों की “बड़ी टुकड़ियां” उपकरण और आवश्यक सामग्री लेकर एक के बाद एक आपदा के केंद्र तक पहुंचने लगीं। थोड़े समय में जिम्मेदारियां बांटने के बाद उन्होंने तुरंत बचाव अभियान शुरू कर दिया और लोगों की व्यापक तलाश, सुरक्षा संबंधी खतरों की जांच तथा राहत सामग्री पहुंचाने समेत विभिन्न कार्यों को तेजी से आगे बढ़ाया।

हर मिनट मानो 60 सेकंड से भी लंबा

चीलोंग सीमा चौकी तक जाने वाली सड़क बहाल हो गई।

2 सितंबर को सुबह की हल्की रोशनी ही फैली थी कि चीन आननंग द्वारा लगाए गए सुरक्षा घेराबंदी के उस पार से खबर आई। पहले किसी ने आवाज लगाई, फिर कदमों की आहट सुनाई दी। देखते ही देखते घेराबंदी के बाहर लोगों की भीड़ बढ़ने लगी। कोई बचाव उपकरण पीठ पर लादे था, तो कोई फावड़ा कंधे पर उठाए हुए। सभी की निगाहें बेसब्री से पहाड़ी दर्रे की ओर जाने वाली सड़क पर टिकी थीं।

पिछली रात मैं अग्निशमन एवं बचावकर्मियों के एक तंबू में ठहरा था और बस चुपचाप बैठा रहा। वह रात जैसे खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। मैं कई बार सुरक्षा घेराबंदी की ओर गया। वहां रोशनी के नीचे कुछ सुरक्षाकर्मी खड़े थे और उनकी परछाइयां बहुत लंबी हो गई थीं। ऊंचे पठारी इलाके की घाटी में रात बेहद ठंडी थी। घाटी के मुहाने से तेज हवा और बारिश भीतर तक आ रही थी, इसलिए मैंने अपना कोट और कसकर लपेट लिया। हर कोई अगली सुबह सड़क बहाल होने की खबर का इंतजार कर रहा था। ऐसा इंतजार भी अपने आप में आपदा राहत और बचाव अभियान का एक हिस्सा था।

इन दिनों सबसे ज्यादा सुनाई देने वाले दो शब्द हैं—“हर समय तैयार रहना” और “हर संभव उपाय करना।” आपदा के सामने ये बेहद सरल शब्द अपने भीतर मजबूत जिम्मेदारी और कर्तव्यबोध समेटे हुए हैं। आने वाले आदेश का इंतजार ही बचावकर्मियों की सबसे बड़ी उम्मीद है। सुरक्षा घेराबंदी के बाहर बीतने वाला हर मिनट सामने सड़क पर आगे बढ़ाए गए हर मीटर की पुष्टि करता है। इस इंतजार में हर मिनट मानो 60 सेकंड से भी लंबा हो गया है। लेकिन सड़क जितनी एक मीटर आगे बढ़ती है, आदेश मिलने का समय भी उतना ही करीब आता जाता है।