शांगहाई सहयोग संगठन की 25वीं वर्षगांठ: ग्लोबल साउथ सहयोग का बहुपक्षीय मॉडल

स्थापना के 25 वर्षों में शांगहाई सहयोग संगठन (एससीओ) छह संस्थापक सदस्य देशों से विकसित होकर आज दुनिया का सबसे व्यापक क्षेत्रफल वाला, सबसे अधिक आबादी वाला और विशाल विकास क्षमता रखने वाला व्यापक क्षेत्रीय सहयोग संगठन बन गया है। एससीओ की जीवनशक्ति केवल इसके विस्तार में नहीं, बल्कि उस सहयोग की सोच में भी निहित है, जो ताकतवर देशों की राजनीति और गुटीय टकराव से अलग है। “शांगहाई भावना” को अपने मूल मूल्य के रूप में अपनाते हुए यह आपसी विश्वास, पारस्परिक लाभ, समानता, परामर्श, विभिन्न सभ्यताओं के सम्मान और साझा विकास की तलाश पर कायम है। अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में प्रतिनिधित्व की कमी, विकास के अंतर और दोहरे मानदंड जैसी चुनौतियों के बीच, एससीओ ने सर्वसम्मति से निर्णय लेने, किसी तीसरे पक्ष को निशाना न बनाने और सभी पक्षों के हितों को ध्यान में रखने वाली संस्थागत व्यवस्था के जरिए ग्लोबल साउथ के लिए अधिक समान और समावेशी बहुपक्षवाद का एक उत्कृष्ट मॉडल पेश किया है।

सबसे पहले, एससीओ सुरक्षा सहयोग का एक मॉडल है। एससीओ ने सैन्य गठबंधन और गुटीय टकराव पर आधारित सुरक्षा मॉडल की नकल नहीं की, बल्कि साझा, व्यापक, सहयोगात्मक और सतत सुरक्षा की अवधारणा को बढ़ावा दिया। आतंकवाद-रोधी प्रयासों, उग्रवाद से निपटने, अंतरराष्ट्रीय अपराध पर कार्रवाई, मादक पदार्थों की तस्करी पर रोक और साइबर सुरक्षा जैसे साझा खतरों से निपटने के लिए सदस्य देशों ने एक स्थिर समन्वय तंत्र विकसित किया है। 2026 के बिश्केक सुरक्षा सम्मेलन में भू-राजनीतिक संघर्षों और साइबर हमलों जैसी नई चुनौतियों को भी प्रमुख एजेंडे में शामिल किया गया। इससे यह सीख मिलती है कि सुरक्षा कुछ देशों की “पूर्ण सुरक्षा” पर आधारित नहीं होनी चाहिए, बल्कि संवाद और सहयोग के जरिए साझा जोखिमों को कम किया जाना चाहिए।

दूसरे, एससीओ राजनीतिक आपसी विश्वास और वैश्विक शासन सहयोग का एक मॉडल है। सदस्य देशों की राष्ट्रीय परिस्थितियों, व्यवस्थाओं और संस्कृतियों में काफी अंतर है, फिर भी एससीओ बड़े और छोटे देशों की समानता के सिद्धांत पर कायम रहते हुए सर्वसम्मति से निर्णय लेने को आगे बढ़ाता है। “मतभेदों को बरकरार रखते हुए समानताएं तलाशने” वाली यह संस्थागत मजबूती साबित करती है कि विविधता बहुपक्षीय सहयोग के लिए बाधा नहीं है। ग्लोबल साउथ के लिए, एससीओ मंच वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार की साझा मांगों को एकजुट करने और अंतरराष्ट्रीय नियमों में संप्रभु समानता, विकास के अधिकार तथा विकासशील देशों के प्रतिनिधित्व को अधिक महत्व दिलाने में मदद करता है।

तीसरे, एससीओ व्यावहारिक सहयोग का एक मॉडल है। संगठन के ढांचे के भीतर अर्थव्यवस्था एवं व्यापार, निवेश, संपर्क एवं कनेक्टिविटी, ऊर्जा और डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों में सहयोग लगातार विस्तार कर रहा है। 2026 में आयोजित एससीओ उद्योगपतियों की समिति की परिषद की बैठक में व्यापार, निवेश और औद्योगिक सहयोग को गहरा करने पर जोर दिया गया, जबकि ऊर्जा मंत्रियों की बैठक में ऊर्जा सुरक्षा, ऊर्जा दक्षता, न्यायसंगत ऊर्जा बदलाव और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग पर चर्चा हुई। एससीओ मॉडल का महत्वपूर्ण मूल्य यह है कि वह विकास को अपने एजेंडे के केंद्र में रखता है और बुनियादी ढांचे की कनेक्टिविटी, औद्योगिक सहयोग तथा क्षमता निर्माण के जरिए विभिन्न देशों की विकास क्षमता को मजबूत करता है।

मानवीय और हरित सहयोग भी एससीओ के बहुपक्षवाद के नए आधार बन रहे हैं। सभ्यताओं के बीच संवाद, शिक्षा, युवाओं, मीडिया और थिंक टैंक आदि के तंत्र लगातार समृद्ध हो रहे हैं, जिससे “सभ्यताओं की विविधता” की अवधारणा सामाजिक संपर्क के नेटवर्क में बदल रही है। साथ ही, सदस्य देश जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन, जैव विविधता, निम्न-कार्बन अर्थव्यवस्था, कचरा प्रबंधन, वायु प्रदूषण तथा ग्लेशियर और जल संसाधनों के संरक्षण जैसे क्षेत्रों में आदान-प्रदान और सहयोग मजबूत कर रहे हैं। इससे विकासशील देशों के लिए हरित बदलाव और विकास की जरूरतों के बीच बेहतर तालमेल बैठाने हेतु सहयोग की नई संभावनाएं पैदा हुई हैं।

बिश्केक में होने वाले आगामी शिखर सम्मेलन को देखते हुए, “ग्लोबल साउथ के मॉडल” के रूप में एससीओ में तीन नए रुझान उभरने की उम्मीद है। पहला, संगठन के तंत्र का आधुनिकीकरण और तेज होगा, जिससे विस्तार के बाद संगठन की कार्यकुशलता और कार्यान्वयन क्षमता बढ़ाई जा सकेगी। दूसरा, सहयोग के मुद्दे और अधिक व्यापक होंगे तथा पारंपरिक सुरक्षा से आगे बढ़कर ऊर्जा बदलाव, डिजिटल शासन और हरित विकास जैसे नए क्षेत्रों तक विस्तार करेंगे। तीसरा, “शांगहाई सहयोग संगठन प्लस” जैसे खुले सहयोग के प्रारूपों का लगातार विस्तार होगा, जिससे सदस्य देशों के बीच सहयोग को ग्लोबल साउथ के व्यापक साझेदार नेटवर्क से जोड़ा जा सकेगा।

उम्मीद है कि बिश्केक शिखर सम्मेलन इन सिद्धांतों को अधिक प्रभावी व्यवस्थाओं, ठोस परियोजनाओं और खुले सहयोग के रूप में आगे बढ़ाएगा। एससीओ ग्लोबल साउथ को अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में बदलाव की प्रक्रिया में भाग लेने के लिए सहयोग और बहुपक्षीय प्रयास का एक बेहतर उदाहरण पेश करेगा।