आर्द्रभूमि रक्षक नियांग नदी के किनारे की कर रहे हैं रखवाली


नियांग नदी के किनारे।(जन-दैनिक ऑनलाइन)

पिछले वर्षों में, नियांग नदी के किनारे रेत और मिट्टी खुली पड़ी रहती थी। पतझड़ और सर्दियों में हवा चलने पर धूल-मिट्टी उड़ती थी, और गर्मियों के बाढ़ के मौसम में नदी का पानी रेत के किनारों और खेतों को बहा ले जाता था। "उस समय नदी के रेतीले टापू पर नाममात्र के पेड़ थे, और हवा चलते ही धूल के कारण आंखें खोलना मुश्किल हो जाता था," आर्द्रभूमि रक्षक फिंतसोक त्सेरिंग ने बताया। 

जंगल की सुरक्षा को लेकर वह कभी भी ज़रा सी भी लापरवाही नहीं बरतते। हाल ही में गश्त के दौरान, उन्होंने नदी किनारे के घास के मैदान में एक अधजली सिगरेट का टुकड़ा देखा, जो विलो के पेड़ों के झुंड से महज़ कुछ कदम दूर था। पठारी घाटियों में तेज़ हवाएं चलती हैं, और एक छोटी सी चिंगारी भी सूखी घास के सहारे फैलकर पूरे जंगल को तबाह कर सकती थी। उन्होंने तुरंत आगे बढ़कर जूते के तले से बची हुई आग को बुझाया, उस टुकड़े को उठाकर बोरे में रखा, और फिर ज़मीन पर झुककर सूखी घास को हटाया तथा हवा के रुख के अनुसार उसे बार-बार पलटकर देखा, और जब यह पक्का हो गया कि दोबारा आग भड़कने की कोई गुंजाइश नहीं है, तभी वे सीधे खड़े हुए और आगे बढ़े।


यानी आर्द्रभूमि।

यानी आर्द्रभूमि में, फिंतसोक त्सेरिंग जैसे कुल 75 पूर्णकालिक आर्द्रभूमि रक्षक तैनात हैं। वे अपने उपकरणों को पीठ पर लादकर घाटी की गहराइयों में जाते हैं और अपने कदमों से दलदली ज़मीन के हर एक कोने की निगरानी करते हैं। दिन-प्रतिदिन, उनकी इस सुरक्षा और देखभाल के तहत यह पठारी नखलिस्तान एक बार फिर से जीवन और हरियाली से मुस्कुरा उठा है।