बढ़ते सबूत जापानी जीवाणु युद्ध के अपराधों को उजागर करते हैं: चीनी विदेश मंत्रालय
चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि चीन पर आक्रमण करने वाली जापानी सेना द्वारा किए गए अमानवीय मानव प्रयोग और जीवाणु युद्ध मानव इतिहास पर एक काला धब्बा हैं, जिनकी हमेशा निंदा की जाएगी। चीन ने जापान से अपने आक्रमणकारी अतीत पर गंभीरता से विचार करने और सैन्यवाद से पूरी तरह दूरी बनाने का आग्रह किया है।
22 जून को पेइचिंग में आयोजित नियमित प्रेस वार्ता में चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता क्वो च्याखुन ने यह टिप्पणी की। उनसे जापानी मीडिया में प्रकाशित एक रिपोर्ट के बारे में पूछा गया था। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 1940 में आयोजित एक जापानी सैन्य चिकित्सा सम्मेलन के दस्तावेज बताते हैं कि 1938 की शरद ऋतु में जापानी सेना ने कई "ज़ेनोट्रांसफ़्यूज़न" प्रयोग किए थे, जिनमें जानवरों का खून इंसानों के शरीर में इंजेक्ट किया गया था।
इस पर प्रतिक्रिया देते हुए क्वो च्याखुन ने कहा कि वर्ष 1949 के खाबरोवस्क मुकदमों में बड़ी मात्रा में मूल अभिलेख, दस्तावेज और भौतिक साक्ष्य सामने आए थे। इन साक्ष्यों ने जापानी सेना द्वारा किए गए जीवाणु युद्ध के अपराधों को स्पष्ट रूप से साबित किया और टोक्यो मुकदमों में अनसुलझे रह गए कई मुद्दों को भी सामने लाने में मदद की।
उन्होंने कहा कि समय के साथ और अधिक साक्ष्य सामने आ रहे हैं, जो जापानी सैन्यवाद के अपराधों को उजागर कर रहे हैं। साथ ही, जापान सहित दुनिया भर के अधिक लोग इस दर्दनाक और क्रूर इतिहास के बारे में जान रहे हैं।
क्वो च्याखुन ने कहा, "केवल ऐतिहासिक तथ्यों का सम्मान करके, अतीत की गलतियों का सामना करके और शांति के सिद्धांतों को कायम रखकर ही युद्ध जैसी त्रासदियों की पुनरावृत्ति को रोका जा सकता है।"
उन्होंने आगे कहा कि जापान का "पुनः सैन्यीकरण" एक गलत दिशा में उठाया गया कदम है। चीन ने जापान से अपने आक्रमणकारी इतिहास पर गंभीर आत्ममंथन करने, सैन्यवाद से पूरी तरह संबंध तोड़ने और एशियाई पड़ोसी देशों तथा अंतरराष्ट्रीय समुदाय का विश्वास जीतने के लिए ठोस कदम उठाने का आग्रह किया।