एससीओ के 25 वर्ष: वैश्विक सहयोग और बहुध्रुवीय व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में अहम भूमिका
15 जून को शांगहाई सहयोग संगठन (एससीओ) ने अपनी स्थापना के 25 वर्ष पूरे किए। पिछले ढाई दशकों में एससीओ ने “शांगहाई भावना” को लगातार आगे बढ़ाया है, जिसमें आपसी विश्वास, पारस्परिक लाभ, समानता, परामर्श, विविध सभ्यताओं का सम्मान और साझा विकास जैसे मूल सिद्धांत शामिल हैं। आज यह दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे अधिक आबादी वाला क्षेत्रीय सहयोग संगठन बन चुका है।
वर्तमान समय में दुनिया कई जटिल चुनौतियों का सामना कर रही है। प्रमुख शक्तियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा, क्षेत्रीय संघर्ष और वैश्विक शासन व्यवस्था पर बढ़ता दबाव अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। ऐसे माहौल में वर्ष 2025 की “एससीओ+” बैठक में चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने वैश्विक शासन पहल पेश की, जिसका उद्देश्य वैश्विक शासन व्यवस्था में एससीओ की भूमिका को और मजबूत करना है।
चीनी सामाजिक विज्ञान अकादमी के रूसी, पूर्वी यूरोपीय और मध्य एशियाई अध्ययन संस्थान के निदेशक सुन च्वांगची का मानना है कि एससीओ का गठन और उसका विकास अंतरराष्ट्रीय संबंधों में बहुध्रुवीयता और लोकतंत्रीकरण की दिशा में बढ़ते रुझान के अनुरूप है। उन्होंने कहा कि एससीओ एकध्रुवीय वर्चस्व और शीत युद्ध की मानसिकता का स्पष्ट विरोध करता है और अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी अलग पहचान बना चुका है।
सुन च्वांगची ने कहा कि एससीओ संयुक्त राष्ट्र की केंद्रीय भूमिका का समर्थन करता है और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय कानून के मानदंडों की रक्षा के लिए सक्रिय रूप से काम करता है। साथ ही, संगठन संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ सहयोग और समन्वय को लगातार मजबूत कर रहा है।
उन्होंने यह भी कहा कि एससीओ वैश्विक दक्षिण के देशों को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यह संगठन अंतरराष्ट्रीय मामलों में विकासशील देशों की आवाज को मजबूती से सामने रखता है और वर्तमान वैश्विक व्यवस्था को अधिक न्यायसंगत और संतुलित दिशा में आगे बढ़ाने का प्रयास करता है।
इसके अलावा, सुन च्वांगची अपने विचार व्यक्त करते हुए यह भी कहा कि क्षेत्रीय शांति के लिए बेहतर परिस्थितियां बनाने हेतु संवाद और वार्ता के माध्यम से विवादों और संघर्षों के समाधान की वकालत करने के लिए एससीओ को अपनी और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठनों (विशेषकर संयुक्त राष्ट्र) की क्षमता को और अधिक बढ़ाने की आवश्यकता है। साथ ही, यह सहयोग के माध्यम से सतत विकास को बढ़ावा देने, बहुपक्षीय सहयोग को आगे बढ़ाने और सभी देशों के आर्थिक विकास के लिए बेहतर वातावरण बनाने पर विशेष बल देता है।